म सँग घाइते 

दिल 

छ ! 

दिल भित्र पुरानो 

खिल 

छ ! 

जिन्दगी चिल 

बिल  

छ !


मन भारी छ 

दुख को 

भकारी 

छ 

समय कुध्दै 

छ 

उमेर बिध्दै 

छ 

आशा पलाउदै 

छ 

निराशा ले 

जलाउदै 

छ 

सपना जल्दै

 छ

काया गल्दै

छ 

समय ले 

छल्दै 

छ ! 


सुख मानौ 

कि दुख 

जीवन को 

रथ वास्तवमा 

यसै गरेर 

चल्दै 

छ !

लब खड्का 

बुढानिलकण्ठ 

काठमाडौ 

२०८२-०९-२०

  जय भद्रकाली !