चारु इस तरह से आदमी सो रहा है
- जेठ ६, २०८२
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इस तरह से आदमी सो रहा है,
सभी से अपनापन खो रहा है।
चारों तरफ़ नफ़रत है फैली,
जिगर वाला आज रो रहा है।
जिसके पास बल है मुट्ठी में,
वो दूसरे का नहीं हो रहा है।
बेहतर इनाम उसे ही अब मिले,
टूटा हुआ दिल जो ढो रहा है।
जिन्दगी लिए उगा है ‘आदित्य’,
उजाले को जहां में बो रहा है।
मिथिलेश आदित्य
स्थान: विराटनगर, नेपाल




















