१)

जाँदैछु धेरै नै दूर अनिदो विरानो शहरदेखि टाढा 

पीडा छातीभित्र अनेक, मुस्कान अधरदेखि टाढा 

पोखिएपछि सपना सबै तुवाँलोभित्र उराठ लाग्दो,

सारथि रहेछ अश्रुधारा, नबनोस् नजरदेखि टाढा।

२)

स्वीकार करो यह तोहफा है गुलसनका 

खुश्बु के साथ महक बागवान चमनका 

भरोसा है जिंदगी, साथ मेरा साया तेरी,

जिगर रहेगी मेरा अन्दर तेरी धड्कनका।

३)

दूरी जति टाढा भएपनि सम्झना करिब भए पुग्छ 

मिलन होस् विछोड आत्मियता अधिक भए पुग्छ 

छातीभित्रको ढुकढुकीमा बाँचोस् जिन्दगी तिम्रो,

यदि म काँडा हुँदा सधैंभरी फूल  समिप भए पुग्छ।

४)

जब ढलती साम खुद साया साथ छोड देता है 

रिवाज है ए मुसिबतका कैसे राह मोड देता है 

ईश्वरीय तोहफा यह शरीर किसको पता नही,

चलते चलते कब सफर कहाँ दम तोड देता है।


- शरद प्रधानाङ्ग, विराटनगर - ७