शिवनारायण सिंगलको-: समाज सेवा///// पद्य कविता
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सेवा है धडकन समाज कि, सेवा धरम की काम
सेवा से सुसमाज बने, सेवा सद्कर्म की पहचान ।
सेवा से बढकर काेई धर्म नहीं, सेवा सुखकी खान
जाे महामना नर बाँटे खुशियाँ, वही सच्चा इन्सान ।
समाज सेवक है सच्चा साधु और हाेते संत सुजान
जाे दीनदु:खी के सेवा करे, वही इन्सान है भगवान ।
वडा सा मन है जिनका यहाँ, वही बनते है मददगार
गरिब जरुरतमन्दाैं का है वह नाविक और पतवार ।
जनहित मे जाे दान करे, उससे बडा न काेई दान
साक्षात नर रुप में उतरे है बन धरतीका भगवान ।
निस्वार्थ सेवा जाे करे नरका जिसमे सबका कल्याण
जन-मन से निकले दुआओं से हाे उनका भी कल्याण ।
जैसे दीपक से अन्धकार मिटे, मिटे ज्ञान से अज्ञान
जाे मानुष भल काम करे, उनका भला करे भगवान ।
वस्त्रदान, द्रव्यदान, और गृह भूमिदान सबसे सच्चा
श्रमदान, सिल्पदान, जल आ बृक्षदान सब से उँचा ।
दानी हरिश्चन्द्र, कर्ण, दधिचि कीर्ति जिनका महान
बिरला काेई काेई हाेतें हैं उनका जन्म भाग्य समान ।
जग में सच्चे याचक दाता , दाेनाे हाेते हैं बडे महान
दाेनाे की यश कीर्ति बढे , आओ हम भी करें सम्मान ।
आओ हम भी करें प्रणाम , आओ हम भी करे प्रणाम ।
वैसा कर्मबीर महापुरुषाें काे मेरा भी कराेडाैं प्रणाम ।
धन्यवाद ! 9842155177
शिवनारायण सिंगल
विराटनगर




















